
नई दिल्ली: सोशल मीडिया की आपाधापी और ‘सबसे पहले’ की अंधी दौड़ ने डिजिटल पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में लोकगायिका नेहा सिंह राठौर से जुड़ी एक फर्जी खबर और वीडियो के प्रसारण मामले ने मीडिया जगत में एक नया बवंडर खड़ा कर दिया है। एबीपी न्यूज़ पर गलत खबर प्रसारित होने के बाद जब गायिका ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी, तो प्रबंधन ने औपचारिक माफी मांग ली। हालांकि, नेहा सिंह राठौर ने स्पष्ट कर दिया है कि महज़ माफी से उनकी धूमिल हुई साख की भरपाई नहीं हो सकती और अब यह मामला अदालत के चौखट पर सुलझेगा।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दुखद और चिंताजनक पहलू वह प्रशासनिक ढर्रा है, जिसके तहत इस बड़ी चूक का सारा ठीकरा डिजिटल विभाग के तीन निचले कर्मचारियों पर फोड़ दिया गया। चर्चा है कि फैक्ट-चेकिंग में लापरवाही के नाम पर डिजिटल वीडियो प्रमुख, शिफ्ट इंचार्ज और यूट्यूब शॉर्ट्स शिफ्ट इंचार्ज की बलि चढ़ा दी गई और उनकी नौकरी समाप्त कर दी गई।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या किसी प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल की संपादकीय नीतियां, प्रसारण की मर्यादा और सत्यता की जवाबदेही केवल ग्राउंड पर या डेस्क पर दिन-रात खटने वाले छोटे पत्रकारों और कर्मचारियों की होती है? जो पत्रकार 24 घंटे टीआरपी और व्यूज के भारी दबाव में काम करते हैं, उनके सिर पर तो तुरंत गाज गिरा दी जाती है, लेकिन शीर्ष पदों पर बैठे आकाओं और प्रबंधन की जिम्मेदारी का क्या?
चैनल का कंटेंट किस दिशा में जाएगा, जांच-परख की प्रक्रिया के क्या मानक होंगे, और डिजिटल होड़ में क्या सीमाएं तय होंगी—ये फैसले ऊपर बैठे जिम्मेदार अधिकारी ही लेते हैं। परंतु जब कोई बड़ा बवंडर खड़ा होता है, तो माफीनामा जारी कर और दो-तीन निचले कर्मचारियों की नौकरी छीनकर संस्थान अपनी साख बचाने की इतिश्री कर लेता है।
नेहा सिंह राठौर के कड़े रुख और ‘कोर्ट में मिलने’ के ऐलान ने इस बात को फिर से सतह पर ला दिया है कि मीडिया संस्थानों में नैतिक जवाबदेही का पैमाना केवल निचले पायदान के कर्मचारियों पर लागू नहीं होना चाहिए। यदि गलती संपादकीय और प्रक्रियात्मक स्तर पर हुई है, तो उसकी जवाबदेही चैनल चलाने वाले बड़े हुक्मरानों को भी सहर्ष स्वीकार करनी होगी, न कि केवल छोटे पत्रकारों की बलि देकर मामला रफा-दफा करना होगा।




