
“अब हम विरासत महोत्सव-2027 में मिलेंगे… नए जोश, नए जुनून और उमंगों के साथ देहरादून, 06 नवंबर 2026: पन्द्रह दिनों तक सुरों, तालों और रंगों के शाही संगम से दून घाटी को झूमाता रहा विरासत महोत्सव-2026 आज अपने अंतिम दिन पर पहुंचकर भावुकता के साथ विदा लेने लगा। गढ़ी कैंट नींबू वाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित इस अद्भुत महोत्सव की समापन संध्या-ए-महफिल ऐसी रही, जिसे दर्शक बरसों तक याद रखेंगे। विश्व विख्यात गायिका उषा उत्थुप के जोशीले गायन ने जहां युवाओं के दिलों को धड़कन पर मजबूर कर दिया, वहीं गया घराने के जुबरदस्त कलाकार पंडित राजन सजौर की समृद्ध ठुमरी और ख़याल गायकी ने संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। देर रात तक चली इस महफिल का भरपूर आनंद सभी मेहमानों और प्रशंसकों ने ख़ूब उठाया।
देहरादून। पन्द्रह दिनों तक सुरों, तालों और रंगों के शाही संगम से दून घाटी को झूमाता रहा विरासत महोत्सव-2026 आज अपने अंतिम दिन पर पहुंचकर भावुकता के साथ विदा लेने लगा। गढ़ी कैंट नींबू वाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित इस अद्भुत महोत्सव की समापन संध्या-ए-महफिल ऐसी रही, जिसे दर्शक बरसों तक याद रखेंगे। विश्व विख्यात गायिका उषा उत्थुप के जोशीले गायन ने जहां युवाओं के दिलों को धड़कन पर मजबूर कर दिया, वहीं गया घराने के जुबरदस्त कलाकार पंडित राजन सजौर की समृद्ध ठुमरी और ख़याल गायकी ने संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। देर रात तक चली इस महफिल का भरपूर आनंद सभी मेहमानों और प्रशंसकों ने ख़ूब उठाया।
मुख्य आयोजक ‘रिच’ संस्था के संस्थापक आरके सिंह और संयुक्त सचिव विजयश्री जोशी सहित संस्था की पूरी टीम ने समापन संध्या में सभी शाही मेहमानों को अलविदा कहते हुए कहा, “अब हम विरासत महोत्सव-2027 में मिलेंगे, नए जोश, नए जुनून और भी अधिक उत्साह-उमंगों के साथ।” इस अवसर पर मौके पर मौजूद संगीत प्रेमियों ने भी गूंजती तालियों और जयकारों से संस्था के इस संकल्प को दोहराया।
राग देश की दो बंदिशों ने बांधा जादू
अंतिम संध्या की शुरुआत पंडित राजन सजौर की बेहतरीन शास्त्रीय प्रस्तुति से हुई। उन्होंने राग देश में ख़याल गायकी प्रस्तुत करते हुए दो बंदिशें गाईं, पहली मध्य लय में एकताल और दूसरी द्रुत लय में तीनताल पर आधारित रही। दोनों बंदिशों में राग की भावपूर्ण अभिव्यक्ति और लयकारी का सुंदर सामंजस्य देखने को मिला। हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्रा की सधी हुई संगत ने गायकी को और भी प्रभावशाली बना दिया। कलाकारों के बीच सुरों और ताल का ऐसा तालमेल था कि श्रोता बार-बार तालियों से उनका अभिनंदन करते रहे।

जानकारों के अनुसार गया घराने का प्रतिनिधित्व करने वाले पंडित राजन सजौर भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत के जानेमाने गायक और ठुमरी प्रतिपादक हैं। उन्होंने पंडित जय राम तिवारी के अधीन अपनी संगीत यात्रा शुरू की और एक दशक से अधिक समय तक पंडित कामेश्वर पाठक से प्रशिक्षण लिया, साथ ही पद्म विभूषण पंडित राजन-साजन मिश्रा से भी अपनी ख़याल और ठुमरी गायकी को निखारा। स्वर्गीय पंडित रामजी मिश्र की गया घराने की समृद्ध ठुमरी और होली परंपराओं को संरक्षित और पुनर्जीवित करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। वे साहित्य कला परिषद के ठुमरी महोत्सव, झंकार उत्सव, आरोहण संगीत कार्यक्रम सहित वाराणसी और पटना के प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति दे चुके हैं। बिहार के गया में ‘सुर सलिला गया जी गुरुकुल’ चलाकर वे बच्चों को मुफ्त संगीत प्रशिक्षण देते हैं और स्थानीय ठुमरी विरासत को जीवित रखने का श्लाघनीय कार्य कर रहे हैं। ‘बी-हाई’ ग्रेड के रेडियो कलाकार पंडित सजौर ने दादरा, कजरी और ख़याल जैसी अनेक पारंपरिक रचनाएं श्रोताओं को समर्पित की हैं।
“अपना दीवाना” बना लेने वाली ऊषा उत्थुप की धूम
समापन संध्या का सबसे बड़ा आकर्षण बनीं मशहूर गायिका उषा उत्थुप। अपनी खास आवाज़, ऊर्जावान अंदाज़ और कई भाषाओं के लोकप्रिय गीतों-तरानों के साथ उन्होंने विरासत की महफिल को गुलो-गुलज़ार होकर महका दिया। दर्शकों की धड़कन उनके गायन की धमक के साथ एक होकर झूमती रही। संगीत, उत्साह और मनोरंजन का ऐसा संगम देखकर युवा भी संध्या को ‘यादगार’ कहने से नहीं चूके। उनके साथ शुभोजित धर ने की-बोर्ड, नेपाल शाह ने बेस गिटार, सिद्धार्थ चटर्जी ने ऑक्टापैड और संपद सामंत ने लीड गिटार पर शानदार संगत की।
भारतीय संगीत जगत में जिन्हें न जानने वाला कोई नहीं, ऐसी उषा उत्थुप 54 वर्षों से अधिक समय से संगीत के माध्यम से सीमाएं पार कर प्रेम, एकता, शांति, सद्भाव और खुशी का संदेश फैला रही हैं। 1969 में चेन्नई के ‘नाइन जेम्स’ नाइटक्लब से करियर की शुरुआत करने वाली उषा जी ने सौ से अधिक एल्बम रिकॉर्ड किए हैं और 17 भारतीय सहित आठ विदेशी भाषाओं में गाती हैं। पारंपरिक मध्यमवर्गीय दक्षिण भारतीय परिवार से आने वाली उषा जी सबसे समकालीन गीतों को भी पारंपरिक वेशभूषा में प्रस्तुत करती हैं, जो भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।

सामाजिक सरोकारों के लिहाज से भी उनकी फेहरिस्त लंबी है। मदर टेरेसा के मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी के लिए प्रेम दान, शिशु भवन और कालीघाट स्थित आश्रम के लिए धन जुटाने से लेकर स्पैस्टिक्स एसोसिएशन, कुष्ठ रोग अस्पतालों, कैंसर, एड्स, महिला तस्करी और बाल शोषण के विरुद्ध काम करने वाले अनगिनत संगठनों के साथ उनका योगदान रहा है। उन्होंने रिचर्ड गेरे फाउंडेशन फॉर एड्स के साथ भी कार्य किया है। गीतों के माध्यम से विश्व के समुदायों को एकजुट करने के लिए उन्हें केन्या की चाबी से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2011 में उन्हें प्रतिष्ठित पद्म श्री और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला, जबकि 2024 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। एक टीईडी वक्ता के रूप में उन्होंने दावोस में विश्व पर्यावरण मंच पर प्रस्तुति देकर स्टैंडिंग ओवेशन बटोरा। यूरोप, अफ्रीका और एशिया में आईसीसीआर के माध्यम से वे भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुकी हैं।
होपटाउन स्कूल की ऑर्केस्ट्रा ने बिखेरा जादू
इससे पूर्व होपटाउन स्कूल की छात्राओं ने ऑर्केस्ट्रा संगीत की आकर्षक प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। ड्रम पर जसमीरा भूटानी, ऑक्टापैड पर शिक्षक गोमित शाह, की-बोर्ड पर मिशिका अग्रवाल और शिक्षक सागर गुसाईं ने संगत की। गायन में गायत्री जुयाल, सान्वी अरोड़ा, गीत सिद्धार्थ डागा, अहेली दत्ता और शिक्षिका सुमन आनंद ने अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा, वहीं तबले पर काश्वी धीमिजा और शिक्षक दिवाकर गांगुली, कैजोन पर सिया रायवानी, दरबुका पर ऋषिका सिंह, जेंबे पर हृदन्या आनंद तथा गिटार पर शिक्षक दीपक थापा और समन्वय देसवाल ने तालबद्ध संगत से प्रस्तुति को मधुर बनाया। ताल, लय और सुरों के इस सामूहिक समन्वय ने महोत्सव मंच पर एक यादगार संगीतमय माहौल बना दिया।

15 दिनों में शास्त्रीय घरानों की शान, अब आगे 2027
जानकारी के अनुसार, 15 दिवसीय इस शाही महोत्सव में भारतीय शास्त्रीय संगीत की जानी-मानी घरानों से आईं विश्व विख्यात हस्तियों ने अपनी-अपनी राग-धुन और सुरों से सुसज्जित शानदार प्रस्तुतियां देकर न सिर्फ दर्शकों को भाव-विभोर किया, बल्कि उनके दिल भी जीत लिए। अब विरासत-2026 की ये भव्य यादें ‘रिच’ संस्था के यादों के पिटारे में सुसज्जित होकर विरासत के एक और अध्याय के रूप में संकलित हो चुकी हैं। संस्था की टीम ने सभी मेहमानों से अलविदा कहते हुए उत्साह से भरपूर घोषणा की कि विरासत महोत्सव-2027 और भी बड़े जोश और जुनून के साथ लौटेगा।



