
12 साल बाद लौटने वाले उत्सव की परंपरा को मंच पर किया गया जीवंत, नई पीढ़ी को उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की पहल
मसूरी। पहाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की अनूठी पहल मसूरी शरदोत्सव की चौथी शाम देखने को मिली। टाउन हॉल में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान केदारखंड के आराध्य देवता श्री घंटाकर्ण देव की जात्रा का विशेष मंचन किया गया। शरदोत्सव के मंच पर पहली बार प्रस्तुत इस देव यात्रा ने दर्शकों को उत्तराखंड की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं से रूबरू कराया। देवता के नौजा निशान और पारंपरिक पूजन पद्धति की झलक देखकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। कई लोगों ने अपने आराध्य देव को नमन कर आस्था प्रकट की। पूरे आयोजन में पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत के प्रति श्रद्धा और अपनत्व का भाव दिखाई दिया।
फिल्म निर्देशक एवं लोक संस्कृति कर्मी प्रदीप भंडारी के निर्देशन में तैयार इस प्रस्तुति के माध्यम से श्री घंटाकर्ण देव की यात्रा को पारंपरिक स्वरूप में मंच पर जीवंत करने का प्रयास किया गया। प्रस्तुति में देव यात्रा से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं, पारंपरिक प्रतीकों और पूजन की विशेषताओं को प्रमुखता से दर्शाया गया। आयोजकों के अनुसार, भगवान शिव के अंश माने जाने वाले श्री घंटाकर्ण देव बदरीनाथ क्षेत्र के क्षेत्रपाल हैं। उनकी पूजा-अर्चना और नौजा निशान की परंपरा उत्तराखंड की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मंच पर इन परंपराओं की झलक देखकर दर्शक न केवल आकर्षित हुए, बल्कि कई श्रद्धालुओं के लिए यह प्रस्तुति अपने आराध्य देव के प्रति आस्था व्यक्त करने का भावुक अवसर भी बनी।
श्री घंटाकर्ण देव की विशाल देव यात्रा का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में होने के कारण इसका विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। देव यात्रा से जुड़ी परंपराएं, नौजा निशान और विशिष्ट पूजन पद्धति इसे अलग पहचान प्रदान करते हैं। शरदोत्सव के मंच पर इस परंपरा को स्थान देना इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा कि इसके माध्यम से उन सांस्कृतिक धरोहरों को व्यापक मंच मिला, जो अब तक मुख्य रूप से अपनी पारंपरिक धार्मिक और क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर ही देखी जाती रही हैं। कार्यक्रम ने दर्शकों को पहाड़ के लोकजीवन में देवी-देवताओं के महत्व और स्थानीय समाज के साथ उनके गहरे जुड़ाव को समझने का अवसर दिया।
फिल्म निर्देशक और लोक संस्कृति कर्मी प्रदीप भंडारी ने बताया कि वर्तमान समय में नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा शहरों में जन्म ले रहा है और वहीं परवरिश पा रहा है। ऐसे में अनेक बच्चों को अपने गांव, पहाड़, लोक परंपराओं और आराध्य देवी-देवताओं के बारे में करीब से जानने का अवसर नहीं मिल पाता। आधुनिक जीवनशैली के बीच अपनी सांस्कृतिक जड़ों से बढ़ती दूरी को देखते हुए श्री घंटाकर्ण देव की जात्रा को मंच पर प्रस्तुत करने की पहल की गई। उनका उद्देश्य है कि युवा अपनी विरासत को केवल पुस्तकों या सुनी-सुनाई बातों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे प्रत्यक्ष रूप से देखें, समझें और उसके धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व को जानने का प्रयास करें।
भंडारी के अनुसार, इस तरह की प्रस्तुतियां नई पीढ़ी में अपनी परंपराओं के प्रति जिज्ञासा और सम्मान विकसित करने में सहायक हो सकती हैं। जब युवा अपनी लोक संस्कृति और आराध्य देवताओं से जुड़ी परंपराओं को करीब से देखेंगे, तो उनके मन में अपनी जड़ों को जानने की इच्छा भी बढ़ेगी। इससे वे अपने पूर्वजों की भूमि, गांवों और पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत की ओर आकर्षित हो सकेंगे। वहीं, पुरानी पीढ़ी के लोगों के लिए भी ऐसे आयोजन अपनी आस्था, स्मृतियों और परंपराओं से दोबारा जुड़ने का माध्यम बनते हैं।
मसूरी शरदोत्सव में श्री घंटाकर्ण देव की जात्रा का मंचन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने उत्तराखंड की लोक विरासत के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता को भी रेखांकित किया। ऐसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय धार्मिक परंपराओं को नई पहचान देने के साथ ही उन्हें व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाया जा सकता है। पहाड़ की संस्कृति में रची-बसी देव यात्राएं, लोक मान्यताएं और पारंपरिक अनुष्ठान यहां के सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग हैं। इन्हें मंच पर प्रस्तुत करना उस सांस्कृतिक धरोहर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है।
शरदोत्सव की चौथी शाम श्री घंटाकर्ण देव की जात्रा ने श्रद्धा और संस्कृति का ऐसा संगम प्रस्तुत किया, जिसमें परंपरा के प्रति सम्मान के साथ उसके भविष्य को लेकर भी संदेश निहित था। नौजा निशान के दर्शन और पारंपरिक पूजन की झलक ने श्रद्धालुओं को भावनात्मक रूप से जोड़ा, वहीं नई पीढ़ी के लिए यह उत्तराखंड की समृद्ध धार्मिक विरासत को जानने और समझने का एक विशेष अवसर बना।



