
तारा जोशी फाउंडेशन के पांच दिवसीय आयोजन में देशभर की लोक संस्कृति और परंपराओं को मिलेगा भव्य मंच
देहरादून। उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक कला, हस्तशिल्प, हथकरघा और संगीत को नई पहचान देने के उद्देश्य से तारा जोशी फाउंडेशन की ओर से ‘श्रौत महोत्सव 2026’ आयोजित किया जा रहा है। आगामी 30 अक्टूबर से 3 नवंबर तक देहरादून के परेड ग्राउंड में होने वाले इस पांच दिवसीय महोत्सव में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, लोक संगीत, प्रतिभा प्रदर्शन, कार्यशालाओं और पारंपरिक कलाओं से जुड़े कार्यक्रमों की भरमार रहेगी। महोत्सव की थीम ‘Celebrating people, preserving traditions’ रखी गई है।
महोत्सव से जुड़ी विस्तृत जानकारी बुधवार को उत्तरांचल प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया के सामने रखी गई। आयोजकों ने बताया कि महोत्सव के माध्यम से कलाकारों, शिल्पकारों और प्रतिभाशाली प्रतिभागियों को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया जा रहा है। कार्यक्रमों का समय सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक निर्धारित है।
ऐसे हैं पांच दिनों के कार्यक्रम
30 अक्टूबर (उद्घाटन): महोत्सव का भव्य उद्घाटन श्रीमती गीता धामी जी की उपस्थिति में होगा। इसके बाद कुलदीप शर्मा द्वारा नाटी किंग के साथ पहाड़ी नाइट की प्रस्तुति दी जाएगी, साथ ही डिजिटल मैजिशियन बादशाह का मैजिक शो भी पहले दिन का आकर्षण रहेगा।
31 अक्टूबर: मुख्य अतिथि पंकज त्रिपाठी जी और विशेष अतिथि श्रीमती मृदुला त्रिपाठी जी की उपस्थिति में दिप्तांशु तिवारी द्वारा बॉलीवुड एवं शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति होगी। अजय तोमर की जौनसारी नाइट और ऐपन आर्ट कार्यशाला इस दिन के खास आकर्षण रहेंगे।
1 नवंबर: विक्की चौहान की पहाड़ी एवं मैशअप संगीत प्रस्तुति के साथ महिला स्वास्थ्य और सशक्तीकरण विषय पर टॉक शो आयोजित होगा। शाम को डांडिया नाइट का आनंद उठाया जा सकेगा।
2 नवंबर: रुहान भारद्वाज की सूफी एवं गढ़वाली संगीत प्रस्तुति दी जाएगी। साथ ही टैलेंट शो के लिए ऑडिशन आयोजित होंगे, जिसमें प्रतिभाओं को अपनी कला दिखाने का अवसर मिलेगा।
3 नवंबर (समापन): पद्मश्री प्रीतम भरतवाण जी, जागर सम्राट ऑफ यूके, की उपस्थिति में ग्रैंड क्लोजिंग सेरेमनी होगी। पुरस्कार विजेताओं का सम्मान और टैलेंट शो का फाइनल इस दिन की मुख्य झलकियां रहेंगी।
फाउंडेशन के अनुसार, महोत्सव में जनता की भागीदारी कलाकारों और शिल्पकारों का उत्साह बढ़ाएगी। सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, पारंपरिक कलाओं के प्रोत्साहन और लोक संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया गया है।



