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दिनेश पंत
उत्तराखंड 2027: क्या इस बार सत्ता की चाबी दिल्ली नहीं, पहाड़ के मतदाता के हाथ में होगी?
भाजपा-कांग्रेस के राजनीतिक वर्चस्व पर क्षेत्रीय अस्मिता की दस्तक, उक्रांद का उभार और त्रिशंकु विधानसभा की बदलती संभावनाएं
उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव महज सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं होने जा रहा। यह उस राजनीतिक व्यवस्था की भी परीक्षा होगा, जिसने राज्य गठन के बाद लगभग एक चौथाई सदी तक प्रदेश की सत्ता को भाजपा और कांग्रेस के बीच झुलाते हुए देखा है। लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ अलग संकेत दे रही हैं। जनता के भीतर पनपता असंतोष, क्षेत्रीय सवालों की बढ़ती प्रासंगिकता, राष्ट्रीय दलों के प्रति मोहभंग और उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) की चुनावी सक्रियता एक ऐसे राजनीतिक परिदृश्य की जमीन तैयार कर रही है, जहां किसी एक दल के लिए पूर्ण बहुमत का दावा करना उतना आसान नहीं रह गया है।
70 विधानसभा सीटों वाले उत्तराखंड में बहुमत का आंकड़ा 36 है। वर्ष 2022 में भाजपा ने 47 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी थी, जबकि कांग्रेस 19 सीटों पर सिमट गई थी। दो सीटें निर्दलीयों और दो बसपा के खाते में गई थीं। भाजपा को लगभग 44.72 प्रतिशत और कांग्रेस को 38.24 प्रतिशत मत मिले थे। यानी दोनों राष्ट्रीय दलों के बीच मतों का अंतर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन सीटों के गणित ने भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिला दिया। सवाल यह है कि क्या 2027 में भी यही गणित दोहराया जाएगा? या इस बार मतदाता चुनावी गणित की पूरी इबारत बदल देगा?
राष्ट्रीय दलों का सबसे बड़ा संकट: सत्ता और विपक्ष, दोनों की विश्वसनीयता
भाजपा के सामने सत्ता विरोधी माहौल से निपटने की चुनौती है। विकास के बड़े-बड़े दावे अपनी जगह हैं, लेकिन पहाड़ के गांवों में खाली होते घर, बंद होते स्कूल, डॉक्टरों के अभाव में जूझते अस्पताल, रोजगार के लिए पलायन और भर्ती परीक्षाओं को लेकर उठते सवाल उन दावों की जमीनी पड़ताल करते हैं। अंकिता भंडारी प्रकरण से लेकर बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के आरोपों तक कई मुद्दे सरकार की राजनीतिक जवाबदेही को लगातार कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। सरकार के पास उपलब्धियों का बहीखाता है, लेकिन मतदाता के पास भी सवालों की लंबी फेहरिस्त है।
दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए भाजपा की नाराजगी अपने आप में सत्ता की गारंटी नहीं है। विपक्ष में बैठकर सरकार की आलोचना करना और जनता के सामने एक भरोसेमंद विकल्प प्रस्तुत करना दो अलग-अलग बातें हैं। कांग्रेस के सामने गुटबाजी, नेतृत्व की स्वीकार्यता, स्थानीय स्तर पर संगठन की मजबूती और चुनाव के बाद भी एकजुट रहने का भरोसा पैदा करने की चुनौती है। उत्तराखंड की जनता पहले भी सत्ता बदल चुकी है, लेकिन सत्ता बदलने के बाद व्यवस्था में कितना बदलाव आया, यह सवाल आज भी अनुत्तरित है।
विडंबना देखिए कि जिस राज्य के निर्माण के लिए लोगों ने लाठियां खाईं, जेलें काटीं और अपनी जवानी कुर्बान की, वहां आज भी मूल निवास, मजबूत भू-कानून, रोजगार और पहाड़ के संसाधनों पर स्थानीय अधिकार जैसे सवाल चुनावी घोषणापत्रों से आगे ठोस समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। राष्ट्रीय दलों की राजनीति का एक बड़ा विरोधाभास यही है कि चुनाव के समय पहाड़ की भावनाएं उनके भाषणों में सबसे ऊपर होती हैं, लेकिन सत्ता की प्राथमिकताओं में अक्सर पीछे छूट जाती हैं।
उक्रांद: राजनीतिक विकल्प नहीं, अधूरे राज्य आंदोलन की आवाज
इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य में उत्तराखंड क्रांति दल की भूमिका को नजरअंदाज करना शायद 2027 के चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक विश्लेषणात्मक दोष होगा। उक्रांद कोई रातोंरात पैदा हुआ चुनावी संगठन नहीं है। यह उस आंदोलन की राजनीतिक अभिव्यक्ति रहा है, जिसने उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की लड़ाई लड़ी। राज्य बना, लेकिन जिस पहाड़ के सपनों ने इस आंदोलन को जन्म दिया था, वे सपने आज भी पूरी तरह साकार नहीं हुए।
यही अधूरापन उक्रांद की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी बन सकता है।
मूल निवास, सशक्त भू-कानून, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार, पहाड़ के जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय अधिकार, स्थायी राजधानी गैरसैंण, पलायन और क्षेत्रीय संसाधनों की सुरक्षा जैसे मुद्दे किसी एक विधानसभा क्षेत्र के मुद्दे नहीं हैं। ये पूरे उत्तराखंड के राजनीतिक और सामाजिक भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं। इन सवालों को राष्ट्रीय दलों की चुनावी सुविधा के बजाय राज्य के दीर्घकालिक हितों के आधार पर उठाने की क्षमता ही उक्रांद को अलग पहचान देती है।
हाल के घटनाक्रम भी इस सक्रियता की ओर संकेत करते हैं। अक्टूबर 2026 में उक्रांद ने सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी और समान विचारधारा वाले क्षेत्रीय दलों के साथ संभावित तालमेल पर मंथन की बात कही। इसके बाद 31 अक्टूबर को 16 विधानसभा क्षेत्रों के लिए प्रत्याशियों की पहली सूची जारी करना भाजपा और कांग्रेस से पहले चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का स्पष्ट राजनीतिक संकेत है। कर्णप्रयाग से आशीष नेगी, पिथौरागढ़ से काशी सिंह ऐरी और द्वाराहाट से पुष्पेश त्रिपाठी जैसे नाम इस सूची में शामिल हैं। यह केवल प्रत्याशी घोषित करने की कवायद नहीं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति को चुनाव के केंद्र में लाने की कोशिश भी है।
हालांकि, उक्रांद के सामने अपना पुराना इतिहास भी है। आंतरिक मतभेद, गुटबाजी और संगठनात्मक कमजोरियों ने कभी उसे उस मुकाम तक नहीं पहुंचने दिया, जिसकी अपेक्षा राज्य आंदोलन के बाद की गई थी। अलग-अलग राजनीतिक धाराओं में बंटने की उसकी कमजोरी को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन यदि इस बार क्षेत्रीय शक्तियां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर साझा मुद्दों पर एकजुट होती हैं, तो यह कमजोरी उसकी सबसे बड़ी ताकत में भी बदल सकती है।
त्रिशंकु विधानसभा: तीसरी ताकत का मतलब केवल सीटें जीतना नहीं
उत्तराखंड में त्रिशंकु विधानसभा की संभावना को भी गंभीरता से देखने की जरूरत है। हालांकि अभी ऐसा कोई विश्वसनीय सर्वेक्षण उपलब्ध नहीं है, जिसके आधार पर 8 से 10 निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत या किसी दल की सीटों का निश्चित अनुमान लगाया जा सके। फिर भी प्रदेश की स्थानीय राजनीति, असंतुष्ट नेताओं की मौजूदगी और बदलते चुनावी समीकरण इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करते।
उत्तराखंड की राजनीति में निर्दलीय उम्मीदवार हमेशा से कुछ सीटों पर निर्णायक रहे हैं। लेकिन इस बार असली दिलचस्पी इस बात में होगी कि क्या क्षेत्रीय दल और स्थानीय मुद्दों पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार मिलकर राष्ट्रीय दलों के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा पाएंगे? यदि भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहा और क्षेत्रीय ताकतों ने कुछ महत्वपूर्ण सीटों पर जीत दर्ज की, तो सरकार बनाने का गणित अप्रत्याशित मोड़ ले सकता है।
लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है। त्रिशंकु विधानसभा केवल किसी तीसरे दल की सीटें जीतने से नहीं बनती, बल्कि इसके लिए दोनों बड़े दलों के बहुमत से दूर रहने और चुनाव बाद राजनीतिक समीकरणों के बनने की परिस्थितियां भी जरूरी हैं। इसलिए इसे संभावना के रूप में देखना चाहिए, भविष्यवाणी के रूप में नहीं।
इस बार सवाल यह नहीं कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा, सवाल यह है कि उत्तराखंड की आवाज कौन बनेगा?
भाजपा कहेगी कि उसने विकास किया है। कांग्रेस कहेगी कि वह भाजपा से बेहतर सरकार देगी। लेकिन उत्तराखंड का मतदाता शायद इस बार दोनों से एक ही सवाल पूछेगा—पिछले 25 वर्षों में आपने हमारे पहाड़ के लिए ऐसा क्या किया, जिसका लाभ यहां की अगली पीढ़ी को अपने ही गांव में मिल सके?
क्या पलायन रुका? क्या पहाड़ के युवाओं को स्थानीय स्तर पर सम्मानजनक रोजगार मिला? क्या गैरसैंण को उसकी संवैधानिक और राजनीतिक गरिमा के अनुरूप स्थान मिला? क्या जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समुदायों का अधिकार मजबूत हुआ? क्या प्रदेश की प्राकृतिक संपदा से होने वाली आर्थिक गतिविधियों में यहां के लोगों की हिस्सेदारी सुनिश्चित हुई?
इन सवालों का जवाब केवल चुनावी मंचों से नहीं, बल्कि पिछले शासन और विपक्ष की भूमिका के रिकॉर्ड से देना होगा।
दरअसल, उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा है कि यहां सरकारें बदलती रहीं, लेकिन पहाड़ की समस्याओं का चरित्र नहीं बदला। चेहरे बदल गए, घोषणाएं बदल गईं, राजनीतिक नारे बदल गए, मगर गांवों से पलायन करने वाले कदम नहीं रुके। दिल्ली और देहरादून के राजनीतिक गलियारों में सत्ता का शोर बढ़ता रहा और पहाड़ के गांवों में सन्नाटा गहराता गया।
इसलिए 2027 का चुनाव केवल भाजपा को हराने या कांग्रेस को जिताने का अवसर नहीं होना चाहिए। इसे उस राजनीतिक सोच को बदलने का अवसर बनना चाहिए, जिसमें उत्तराखंड को केवल पर्यटन, तीर्थाटन, खनन और राजस्व के नजरिये से देखा जाता है।
उक्रांद के लिए भी यह चुनाव भावनात्मक विरासत के सहारे जीत हासिल करने का नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक सामर्थ्य को प्रमाणित करने का अवसर है। उसे स्पष्ट आर्थिक दृष्टि, मजबूत संगठन, ईमानदार नेतृत्व, युवा भागीदारी और सभी 70 सीटों पर व्यावहारिक रणनीति के साथ सामने आना होगा। केवल राज्य आंदोलन का इतिहास पर्याप्त नहीं होगा; जनता को भविष्य का भरोसा भी देना होगा।
उत्तराखंड को तीसरा विकल्प नहीं, अपने हितों का पहला विकल्प चाहिए।
हो सकता है 2027 में भाजपा फिर बहुमत हासिल कर ले। यह भी संभव है कि कांग्रेस सत्ता में लौट आए। और यह संभावना भी बनी हुई है कि क्षेत्रीय शक्तियों तथा निर्दलीयों की भूमिका विधानसभा का गणित बदल दे। लेकिन इन सभी संभावनाओं के बीच एक बात स्पष्ट है, उत्तराखंड की राजनीति को अब केवल दो राष्ट्रीय दलों की चुनावी रस्साकशी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
जिस प्रदेश को बनाने के लिए एक पूरी पीढ़ी ने संघर्ष किया, उस प्रदेश की सत्ता और नीति निर्धारण में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की निर्णायक भागीदारी का समय आना चाहिए।
क्योंकि उत्तराखंड केवल दिल्ली के राजनीतिक नक्शे पर दर्ज एक राज्य नहीं है। यह उन लोगों की जमीन है जिन्होंने अपनी पहचान, अपने अधिकार और अपने भविष्य के लिए अलग राज्य मांगा था।
अब फैसला मतदाता को करना है कि वह अगले पांच साल भी पुराने राजनीतिक विकल्पों के बीच अपना प्रतिनिधि चुनता है या उस अधूरे सपने को पूरा करने के लिए नई राजनीतिक दिशा तलाशता है।
2027 में असली मुकाबला भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं, बल्कि पुरानी सत्ता की राजनीति बनाम उत्तराखंड की अपनी राजनीतिक चेतना का हो सकता है। और अगर यह चेतना वोट में बदल गई, तो चुनाव का परिणाम केवल विधानसभा की सीटें नहीं बदलेगा, उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास भी बदल सकता है।
( लेख में प्रकट लेखक के निजी विचार हैं।)




