
नई दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूचियों की पारदर्शिता को लेकर एक बड़ा निर्णय लिया है। अब मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को ड्राफ्ट और अंतिम मतदाता सूचियां मशीन रीडेबल यानी सर्च करने योग्य पीडीएफ प्रारूप में दी जाएंगी। यह निर्णय कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी द्वारा लंबे समय से उठाई जा रही मांग को मानते हुए लिया गया है। अब तक दलों को वोटर लिस्ट इमेज-पीडीएफ के रूप में दी जाती थी, जिसमें कंप्यूटर से खोज और विश्लेषण मुश्किल था।
क्या बदला
चुनाव आयोग ने 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष सारांश पुनरीक्षण (SSR) की घोषणा के साथ यह नया प्रावधान किया है। इसके तहत राजनीतिक दलों को ड्राफ्ट और फाइनल मतदाता सूची, बिना मतदाताओं की तस्वीरों के, पढ़ने और सर्च करने योग्य पीडीएफ में मिलेगी।
आयोग ने यह भी कहा है कि ड्राफ्ट चरण में जोड़े गए, हटाए गए और संशोधित नामों की पूरक सूची भी दलों को उपलब्ध कराई जाएगी। इससे दल यह ट्रैक कर पाएंगे कि किसी मतदाता सूची में कब, कहां और किस तरह का बदलाव हुआ।
राहुल गांधी की लंबी मांग
मशीन रीडेबल वोटर लिस्ट की मांग कांग्रेस और राहुल गांधी लंबे समय से उठाते आए हैं। कांग्रेस का तर्क था कि इमेज-आधारित सूचियों में डुप्लीकेट नाम, असंगत पते, अस्पष्ट तस्वीरें और संदिग्ध प्रविष्टियों की पहचान करना लगभग असंभव हो जाता है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने यह मुद्दा संसद में भी उठाया था। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा था, जबकि पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने आयोग से कई बार मुलाकात की थी। आयोग ने पहले यह मांग ठुकराते हुए गोपनीयता और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया था।
महादेवपुरा विवाद
इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर तब गति मिली जब राहुल गांधी ने अगस्त 2025 में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कर्नाटक की महादेवपुरा विधानसभा सीट के मतदाता सूची विश्लेषण का दावा किया था। उन्होंने कहा था कि इस सीट में करीब 1 लाख 25 हजार वोट संदिग्ध या अनियमित थे। कांग्रेस ने यह दावा डुप्लीकेट मतदाता, असत्यापित पते, एक ही पते पर दर्ज कई मतदाता और अस्पष्ट तस्वीर वाली प्रविष्टियों के आधार पर किया था।
कांग्रेस का कहना था कि सिर्फ एक सीट के विश्लेषण में ही पार्टी की बड़ी टीम को महीनों लग गए, क्योंकि सूची कंप्यूटर-रीडेबल नहीं थी। पार्टी ने इसी वजह से पूरे देश की मतदाता सूचियों का वैज्ञानिक और डेटा-आधारित ऑडिट संभव बनाने के लिए मशीन रीडेबल लिस्ट देने की मांग की थी।
2018 का मध्य प्रदेश मामला
यह बहस 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से भी जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट के अभिलेखों के अनुसार, जनवरी 2018 से जुलाई 2018 के बीच निरंतर अपडेशन के दौरान राज्य की मतदाता सूची से लगभग 24 लाख प्रविष्टियों की शुद्ध कटौती हुई थी।
कांग्रेस ने तब 27 लाख संदिग्ध नामों की पहचान का दावा किया था। आयोग ने आरोपों को गलत बताया था, लेकिन बाद में बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। विपक्ष ने सवाल उठाया था कि यदि आरोप गलत थे, तो इतनी बड़ी संख्या में नाम क्यों काटे गए।
राजनीतिक असर
कांग्रेस ने आयोग के इस फैसले को देर से लिया गया कदम बताया है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। पार्टी का आरोप है कि आयोग ने वर्षों तक राहुल गांधी और कांग्रेस की पारदर्शिता संबंधी मांग को टाला और अब परिस्थितियों के दबाव में यह निर्णय लिया है।
वहीं, चुनाव आयोग का यह कदम मतदाता सूचियों की जांच, दावों-आपत्तियों और चुनावी विवादों के निपटारे में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। अब दल डेटा के आधार पर डुप्लीकेट प्रविष्टियां, असंगत नाम और सूची में हुए बदलावों की पहचान अधिक आसानी से कर सकेंगे।
आगे क्या होगा
नई व्यवस्था के तहत राजनीतिक दलों को पेन ड्राइव जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी वर्णानुक्रम में तैयार मतदाता सूचियां निर्धारित शुल्क पर मिल सकेंगी। चुनाव से पहले के राज्यों के उम्मीदवारों को भी ड्राफ्ट और फाइनल सूचियों की सॉफ्ट कॉपी दी जाएगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय चुनावी प्रक्रिया में जवाबदेही बढ़ा सकता है, लेकिन इसका असली परीक्षण तब होगा जब दलों को वास्तव में समय पर, पूरी और प्रभावी रूप से खोजने योग्य सूचियां मिलेंगी।



