
सतपाल महाराज ने किया महोत्सव का शुभारंभ, विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे लोककलाकारों ने मंच पर जीवंत की उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत
देहरादून। पहाड़ की लोकधुनें, पारंपरिक वेशभूषा और लोकनृत्यों की आकर्षक छटा… उत्तराखंड कौथिग के पहले दिन पूरा माहौल लोकसंस्कृति के रंगों से सराबोर नजर आया। अखिल गढ़वाल सभा की ओर से आयोजित इस सांस्कृतिक महोत्सव का शुभारंभ शनिवार को प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज ने किया। प्रदेश के अलग-अलग अंचलों से पहुंचे कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों के जरिए उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोकजीवन की विविधता को मंच पर उतारा।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में दिगंबर सिंह नेगी मौजूद रहे। आयोजन से पहले सभा के अध्यक्ष रोशन धस्माना और महासचिव गजेंद्र भंडारी ने अतिथियों का पारंपरिक उत्तराखंडी टोपी और अंगवस्त्र भेंट कर स्वागत किया।
इस अवसर पर कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि अखिल गढ़वाल सभा प्रदेश की लोकसंस्कृति को सहेजने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि लोककलाएं और परंपराएं किसी भी समाज की पहचान होती हैं। ऐसे आयोजन युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ ही सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने सभा के प्रयासों की सराहना करते हुए सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए हरसंभव सहयोग का भरोसा दिया।
वीर नृत्य से छोलिया तक, मंच पर दिखी पहाड़ की सांस्कृतिक विविधता
सांस्कृतिक संध्या का आगाज चमोली जिले के थराली स्थित पिंडर घाटी बधानी समिति के कलाकारों ने वीर नृत्य की प्रस्तुति से किया। पारंपरिक लोकबोलों और जोशपूर्ण अंदाज में कलाकारों ने उत्तराखंड की वीरता और गौरवशाली परंपरा की झलक दिखाई।
इसके बाद अल्मोड़ा के चंदन बोरा के नेतृत्व में कलाकारों ने प्रसिद्ध छोलिया नृत्य की प्रस्तुति दी। पारंपरिक वेशभूषा, सधे हुए कदमों और लोकसंगीत की धुनों ने दर्शकों को खूब आकर्षित किया।
नंद लाल भारती के नेतृत्व में चकराता के जौनसारी जनजातीय लोककला मंच ने हारुल नृत्य प्रस्तुत कर जौनसार की सांस्कृतिक पहचान को सामने रखा। वहीं, जोशीमठ की भोटिया सांस्कृतिक कला मंच समिति के कलाकारों ने बगड़वाल और पौणा नृत्य के माध्यम से सीमांत क्षेत्रों की लोकपरंपराओं से दर्शकों को रूबरू कराया।
बबीता शाह लोहनी के नेतृत्व में ‘हमारी पहचान रंगमंच’ के कलाकारों ने ‘ऐजा हे सुनार दही-भात खेजा’ गीत पर झोड़ा नृत्य की शानदार प्रस्तुति दी। वहीं, हेमंत बुटोला के संगम सांस्कृतिक मंच ने ‘रणसिंह बाजो, तुतरी बाजी’ की प्रस्तुति से पहाड़ के पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोकधुनों की खूबसूरती को जीवंत कर दिया। एक के बाद एक प्रस्तुतियों पर दर्शकों ने तालियों से कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।
कार्यक्रम का संचालन उदय शंकर भट्ट ने किया। उपाध्यक्ष निर्मला बिष्ट ने अतिथियों, कलाकारों और दर्शकों का आभार जताया। इस दौरान महासचिव गजेंद्र भंडारी, प्रचार सचिव अजय जोशी, प्रदीप असवाल, बीरेंद्र, सूर्य प्रकाश भट्ट, संतोष गैरोला, संगीता ढोंडियाल, दिनेश बौराई, मुनिराम सकलानी, तारेश्वरी भंडारी, बबीता शाह लोहनी, रीता भंडारी और रेखा बडोनी सहित अनेक लोग मौजूद रहे।
दूसरे दिन थड़िया, चौफुला और झोड़ा की रहेगी धूम
कौथिग के दूसरे दिन रविवार, 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजे से थड़िया, चौफुला और झोड़ा नृत्य की प्रस्तुतियां होंगी। वहीं, शाम छह बजे से विशेष लोकसंगीत संध्या आयोजित की जाएगी। इसमें पद्मश्री बसंती बिष्ट के साथ लोकगायक रोहित चौहान, अनिल बिष्ट, भूपेंद्र बसेड़ा और आलोक मलासी अपनी प्रस्तुतियों से समां बांधेंगे। दूसरे दिन भी दर्शकों को उत्तराखंड की लोकगायिकी और पारंपरिक संगीत के विविध रंग देखने-सुनने को मिलेंगे।



