
विरोध करो तो गुंडई! आखिर इन पर लगाम लगाएगा कौन?
देहरादून। सवारियां उठाने की होड़, प्रेशर हॉर्न का आतंक, मनमानी ब्रेकिंग और विरोध करने पर गुंडई! सवाल सिर्फ बस चालकों का नहीं, उस व्यवस्था का भी है जो हादसे का इंतजार करती दिखाई देती है।
देहरादून की सड़कों पर इन दिनों सिटी बसों को देखकर कई बार लगता है कि ये सार्वजनिक परिवहन के साधन हैं या सड़क पर दौड़ते हुए ऐसे विशेषाधिकार प्राप्त वाहन, जिनके लिए यातायात के नियम शायद किसी दूसरी दुनिया में बनाए गए हैं। इनके कुछ चालकों की ड्राइविंग देखकर तो ऐसा लगता है मानो सड़क इनके बाप-दादाओं की जागीर हो और बाकी वाहन चालक सरकार से अनुमति लेकर उस पर चल रहे हों!
सवारी दिखाई दी तो अचानक ब्रेक, आगे निकलने का मौका मिला तो अंधाधुंध ओवरटेकिंग, रास्ता नहीं मिला तो प्रेशर हॉर्न का कानफोड़ू प्रदर्शन। पीछे कौन चल रहा है, बगल में कौन है, किसी दोपहिया चालक की जान जोखिम में पड़ सकती है या किसी कार चालक को अचानक ब्रेक लगाकर दुर्घटना से बचना पड़ सकता है, इससे इन्हें कोई विशेष सरोकार नहीं दिखाई देता। आखिर मंजिल तक पहुंचने की जल्दी इतनी भी क्या कि रास्ते में दूसरों की जिंदगी ही दांव पर लगा दी जाए?
सवाल यह है कि सवारी उठाने का अधिकार किसने दिया, सड़क पर मौत बांटने का लाइसेंस किसने दिया?
सिटी बस सार्वजनिक परिवहन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हजारों लोग रोजाना इनसे सफर करते हैं। लेकिन जब सवारी भरने की होड़ यातायात के सामान्य अनुशासन पर भारी पड़ने लगे, तब यह सुविधा असुविधा और खतरे में बदल जाती है। दूसरी गाड़ी को ओवरटेक करने के बाद अचानक सवारी के लिए ब्रेक मार देना, बिना पर्याप्त दूरी और संकेत के लेन बदलना या बीच सड़क पर वाहन रोक देना केवल लापरवाही नहीं, गंभीर दुर्घटना को न्योता देने वाला व्यवहार है।
और दुर्घटना हो जाने पर? तब शुरू होता है आरोप-प्रत्यारोप का नया अध्याय। गलती किसकी थी, यह तय होने से पहले ही सड़क पर बहस, अभद्रता और दबंगई का माहौल बन जाता है। विरोध करने वाले को ही आंखें दिखाने की कोशिश की जाती है। हालांकि हर चालक को एक ही तराजू में तौलना उचित नहीं, लेकिन जिन चालकों का व्यवहार ऐसा है, उनके लिए वर्दी, परमिट और सार्वजनिक सेवा की जिम्मेदारी का अर्थ समझना जरूरी है।
एम्बुलेंस भी रास्ता मांगे तो साहब की बस नहीं रुकती?
सड़क पर प्रेशर हॉर्न का इस्तेमाल भी एक बड़ा सवाल है। आगे वाहन चल रहा है तो लगातार हॉर्न बजाकर उसे परेशान करना, खाली सड़क पर भी ध्वनि प्रदूषण फैलाना और दूसरे वाहन चालकों पर अनावश्यक दबाव बनाना आखिर किस नियमावली का हिस्सा है? इससे भी गंभीर स्थिति तब बनती है, जब आपातकालीन वाहन को रास्ता देने में लापरवाही बरती जाती है।
एम्बुलेंस में बैठा मरीज किसी की प्रतीक्षा नहीं कर सकता। उसके लिए एक-एक मिनट कीमती हो सकता है। ऐसे में यदि कोई चालक अपनी सुविधा या जल्दबाजी को प्राथमिकता देकर रास्ता देने में बाधा पैदा करता है, तो यह केवल यातायात की समस्या नहीं, मानवीय संवेदनशीलता का भी सवाल है।
सवाल सीधा है, क्या सार्वजनिक परिवहन चलाने वाले व्यक्ति को यह बुनियादी समझ नहीं होनी चाहिए कि सड़क साझा है, निजी संपत्ति नहीं?
बस चालक को नियम पढ़ाने वाला आखिर कौन?
किसी भी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में चालक का प्रशिक्षण, वैध ड्राइविंग लाइसेंस, निर्धारित श्रेणी की पात्रता, आवश्यक परिवहन प्राधिकरण की शर्तें और वाहन की फिटनेस महत्वपूर्ण हैं। व्यावसायिक वाहन चालकों के लिए लागू बैज या अन्य दस्तावेजों की जरूरत भी संबंधित नियमों के अनुसार सुनिश्चित की जानी चाहिए। चालक की निर्धारित वर्दी और परिचालक के व्यवहार से जुड़े नियमों का पालन भी जांच के दायरे में आना चाहिए।
लेकिन देहरादून की सड़कों पर दिखाई देने वाली कुछ घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि इन नियमों की जांच आखिर कितनी नियमित और प्रभावी है? क्या बसों के दस्तावेज, चालकों की पात्रता, फिटनेस, परमिट और सुरक्षा संबंधी उपकरणों की समय-समय पर जांच होती है? क्या शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाती है, या फिर व्यवस्था किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही जागती है?
बिना प्रमाण किसी चालक के लाइसेंस या बैज को अवैध कहना उचित नहीं होगा। मगर इनकी नियमित जांच की मांग करने के लिए किसी हादसे का इंतजार करना भी जरूरी नहीं है।
चालान की औपचारिकता या व्यवस्था में सुधार?
समस्या केवल इतनी नहीं कि कभी-कभार चालान काट दिया जाए। असली सवाल है कि कार्रवाई का असर कितने दिन रहता है। यदि नियम तोड़ने वाले वाहन कुछ समय बाद फिर उसी अंदाज में सड़क पर दौड़ने लगते हैं, तो समझना होगा कि दंड का डर पर्याप्त नहीं है या निगरानी में कहीं गंभीर कमी है।
प्रशासन को चाहिए कि सिटी बसों के प्रमुख मार्गों पर नियमित और औचक जांच की जाए। खतरनाक ओवरटेकिंग, अचानक ब्रेक लगाकर सवारी उठाने, अनुचित हॉर्न के इस्तेमाल और एम्बुलेंस को रास्ता न देने जैसी शिकायतों पर प्रमाण के आधार पर कार्रवाई हो। बार-बार गंभीर उल्लंघन करने वाले चालकों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कदम उठाए जाएं। जहां परमिट या वाहन संबंधी उल्लंघन सामने आएं, वहां संबंधित प्राधिकरण भी अपनी जिम्मेदारी निभाए।
बसों में शिकायत दर्ज कराने के लिए स्पष्ट संपर्क विवरण हों। यात्रियों और दूसरे वाहन चालकों की शिकायतों पर कार्रवाई की स्थिति बताई जाए। जरूरत पड़ने पर बस संचालकों की बैठक बुलाकर उन्हें यातायात नियमों, यात्रियों की सुरक्षा और सार्वजनिक सेवा की जिम्मेदारियों के प्रति जवाबदेह बनाया जाए।
आखिर प्रशासन की आंख कब खुलेगी?
देहरादून एक बढ़ता हुआ शहर है। यहां यातायात का दबाव पहले ही कम नहीं है। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन को अनुशासित बनाना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि ऐसा विषय जिसे कुछ चालान काटकर निपटा दिया जाए।
जिलाधिकारी, एसएसपी, यातायात पुलिस और परिवहन विभाग को इस समस्या पर समन्वित कार्रवाई करनी चाहिए। शहर के नागरिकों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि सड़क पर नियम सबके लिए बराबर हैं, चाहे वह निजी कार चलाने वाला हो, दोपहिया चालक हो या सैकड़ों यात्रियों को लेकर चलने वाली सिटी बस का चालक।
सिटी बस चलाना केवल स्टीयरिंग घुमाना और सवारियां भरना नहीं है। यह दर्जनों जिंदगियों की जिम्मेदारी उठाना है।
प्रशासन को यह समझना होगा कि सार्वजनिक परिवहन का मतलब सार्वजनिक सुरक्षा भी है। बस चालक की रोजी-रोटी महत्वपूर्ण है, लेकिन सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों की जिंदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसी को भी यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह अपनी कमाई की होड़ में दूसरों की सुरक्षा को नजरअंदाज करे।
अब सवाल फिर वही है। क्या देहरादून का प्रशासन इन बसों को नियमों के दायरे में लाने के लिए ठोस कदम उठाएगा, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद जांच समिति, बयान और आश्वासनों का वही पुराना सिलसिला शुरू होगा?
क्योंकि सड़क पर हादसा होने के बाद मुआवजे और जांच की बात करना आसान है, लेकिन हादसा होने से पहले व्यवस्था को जगाना असली प्रशासनिक जिम्मेदारी है।
देहरादून की जनता को आश्वासन नहीं, सुरक्षित सड़कें चाहिए। और सुरक्षित सड़कें तभी मिलेंगी, जब नियम किताबों से निकलकर सड़क पर भी दिखाई देंगे।



